Tuesday, May 12, 2009

बिछडे हुए पल

जिसे टूट कर चाहा पागल की तरह

उसकी आँखों में कोई काजल की तरह

न जाने क्यो भूल गए वो यार मेरे

जो पहले मिलते ही लिपट जाते थे आँचल की तरह

जिसके कदमो के आहटसे होती है दिल में संश नाहट

जिसकी एक इशारों पर घूमता था पागल की तरह

उसके दिल में बसा कोई काजल की तरह

क्यो टूट जाते है यार में शीशे की तरह

जो फले मिलते ही लिपट जाते थे आचल की तरह

उसकी निगाहों में था एक जादू

जिसमे खीचा चला जाता था बिजली की तरह

गीतों में अपने प्यार का इजहार करता था

सरगम में सजे तारो की तरह

पहले मेरे आने से होते थे

जिसके लव चादनी की तरह

वो मिलते ही लिपट जाते थे आँचल की तरह

4 comments:

  1. kafi gahrayi se likha hai gyanesh ji par gayab mat hoiyega likhte rahe .aapka blog jagat me swagat hai

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  2. dil nahi dimag se kam lo.pyar vyar apni dictionary se hta do.phir mauz hi mauz hai pal bichhudenge nahi warn nye nye pal aapka swagat krenge.

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  3. aap ki kavita padkar bahut achchha lagaa. aise hi likhte rahiye.

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  4. bhai har pal anmol hota hai ... isliye aaj ke har pal ko jiyo kal kya ho pta nahi,

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